राधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 58 of 92

(राग धनाश्री) तेरौ बुरौ न कोऊ मानै। रस की बात मधुप नीरस सुनु, रसिक होत सो जानै॥ [1] दादुर बसै निकट कमलन के, जन्म न रस पहिंचानै। अलि अनुराग उड़न मन बाँध्यो, कहे सुनत नहिं कानै॥ [2] सरिता चलै मिलन सागर को, कूल मूल द्रुम भानै। कायर बकै, लोह तें भाजै, लरै जो सूर बखानै॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग धनाश्री) तेरौ बुरौ एन कुओ मनई। मधुप नीरस रस को सुनता है, रस पाता है, सीखता है। [1] दादुर कमल के निकट निवास करता है, उस तक न तो जन्म पहुंचता है और न ही रस। अली अनुराग, उड़ता मन, क्यों नहीं सुनता कनाई.. [2] नदी बहती है सागर से मिलने, बन जाती है पूर्ण मौलिक ढोल। क्यार बाकै, लोह तीन भजै, लराई जो सुर बखानै.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
तज मन हरि विमुखन को संगठाड़े मनमोहन सुन्दर यमुना