हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 6 of 92
ब्रज-वासी-पटतर कोऊ नाहीं।
ब्रह्म, सनक, सिव, ध्यान न पावत,
इनकी जूँठन लै लै खाहीं॥ [1]
हलधर कह्यो, छाक जैवत सँग,
मीठौ लगत सराहत जाहीं।
'सूरदास' प्रभु जो विस्वम्भर,
सो ग्वालनके कौर अघाहीं॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
ब्रज-वासी-पत्तर कुआं नं. ब्रह्मा, सनक, शिव, ध्यानहीन, फंस रहे हैं। [1] कह हलधर, चक जीवत संग, मिट्ठौ लगत सुरहत जाहि। 'सूरदास' प्रभु जो विश्वम्भर, सो ग्वालनाके कौर अघाहिं.. [2] - श्री सूरदास, सूर सागर