हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 61 of 92
ऊधौ, कर्मन की गति न्यारी।
सब नदियाँ जल भरि-भरि रहियाँ सागर केहि बिध खारी॥ [1]
उज्ज्वल पंख दिये बगुला को कोयल केहि गुन कारी।
सुन्दर नयन मृगा को दीन्हे बन-बन फिरत उजारी॥ [2]
मूरख-मूरख राजे कीन्हे पंडित फिरत भिखारी।
‘सूर श्याम’ मिलने की आसा छिन-छिन बीतत भारी॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
ऊधौ कर्म की गति न्यारी है। सारी नदियाँ पानी से भरी रहीं, महासागर मौन रहे... [1] कोयल ने बगुले को चमकीले पंख दिए और कुछ गाया। सुन्दर आँखें हिरण को प्रकाश की भाँति विचलित कर देती हैं। 'सूर श्यामा' मिलन की आशा खोना भारी है.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर