तज मन हरि विमुखन को संग

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 8 of 92

(राग बिलावल) दीप मालिका को दिन आयौ। नन्द राय सों कहत धरनि यो यह उच्छव मन भायौ॥ [1] गोपी सकल साज सजि चल के नन्दराय दरबार सुहायौ। कंचन थार साजि धरि दीपक गावत गीत मन भायौ॥ [2] भीर भई यसुमति के आँगन बृजनारी संकल्प करायौ। दीपदान की होत आरती सूरदास जस गायौ॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग बिलावाला) डुबकी मलिका का दिन आये। नंद राय का बेटा कहता है, 'धरनि यो ये उछाव मन भयौ'। [1] गोपी सज-धज कर नन्द राय के दरबार में जाती है और भोग लगाती है। कंचन के सिंहासन से सजी धरती, गावत गीत के दीपक, मेरा मन डरता है... [2] डरो, यसुमति के आंगन में संकल्प करो। सूरदास के जाते ही दीपदान की आरती.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिहम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति