राधा परम निर्मल नारि

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 85 of 92

(राग बिहागरौ) राधा परम निर्मल नारि। कहति हौ मन कर्मना करि, हृदय दुविधा टारि॥ [1] स्याम कौ इक तुही जान्यौ, दुराचारिनि और। जैसे घट पूरन न डोलै, अध भरौ डगडौर॥ [2] धनी धन कबहूँ न प्रगटै, धरै ताहि छपाइ। है महानग स्याम पायौ, प्रगटि कैसै जाइ॥ [3] कहति हौ यह बात तोसौ, प्रगट करिहौ नाहिं। ‘सूर’ सखी सुजान राधा, परसपर मुसुकाहिं॥ [4] - श्री सूरदास, सूरसागर (10.1843) (राग बिहागरौ) राधा परम पवित्र नारी है। आप कहते हैं कि काम सोच-समझकर करना चाहिए, मन दुविधा से भर जाता है। जैसे घट पूरण नहिं डोलै, अध भयौ दगडौर.. [2] धनि धन न प्रगटै कौन बहुं, धरै ताहि फले। है महानाग स्याम प्यु, प्रगति कैसे जय.. [3] तुम यह कहते हो, लेकिन तुम इसे तोड़ोगे, तुम इसे प्रकट नहीं करोगे। 'सूर' मित्र सुजन राधा, परस्पर सुख। [4] - श्री सूरदास, सूरसागर (10.1843)
राधा माधव भैंट भईऐसैं बसिऐ ब्रज की बीथिनि