ऐसौ बरसानों निरखि गहबर आयो प्रेम
Tirthannda — श्री नागरीदास
Verse 1 of 3
ऐसौ बरसानों निरखि, गहबर आयो प्रेम।
करत दण्डवत लुटत रज, छुटि गये राजस नेंम॥
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, तीर्थानंद (28)
ये बारिशें अपार हैं, प्यार गहरा है। मैं प्रणाम करता हूँ, राजाओं ने राज्य लूटा.. - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिन्हा), श्री नागरीदास जी के वचन, तीर्थानन्द (28)