हों व्रज मागनों जू व्रज तजि अंत न जाऊँ जू
Upadesh Granths —
Verse 2 of 2
हों व्रज मागनों जू। व्रज तजि अंत न जाऊँ जू॥
बड़े बड़े भूपति भूतल में दाता सूर सुजान जू।
कर न पसरों, सिर न नवाऊँ या ब्रज के अभिमान जू॥
- श्री गदाधर भट्ट जी, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी, उपदेश पद (11)
माननीय व्रज मगनं कनिष्ठ व्रज तजी अंत न जौं जू.. बड़े बड़े भूपति भूतल में दाता सुर सुजान जू. न मैं कर फैलाता हूं, न मुझे ब्रज का अभिमान है.. - श्री गदाधर भट्ट जी, श्री गदाधर भट्ट जी के भाषण एवं उपदेश (11)