श्री वृंदावन स्वामिनी करि सुदृष्टि इहि ओर

Utkntha Madhuri — श्री माधुरी दास

Verse 12 of 15

श्री वृंदावन स्वामिनी, करि सुदृष्टि इहि ओर। वृष्टि करौ अनुराग की, कृपा कटाक्षन कोर॥ - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (10) श्री वृन्दावन स्वामी, कारी सुदृष्टि हिहि हां। प्रेम की वर्षा हो, दया व्यंग्य है.. - श्री माधुरी दास, उत्सुक माधुरी (10)
और कहाँ ते सुमरियेऔर कहाँ ते सुमरिये