और कहाँ ते सुमरिये
Utkntha Madhuri — श्री माधुरी दास
Verse 14 of 15
वामुख की आशा लगी, तजी आस सब जोग।
अब स्वासा हू तजेगी, जो न बने संजोग॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (28)
वमुख की आशा लागी, तजि अस सब जोग। अब सांसें ताजी होंगी, जो मिलन बनेंगी.. - श्री माधुरी दास, उत्कंठ माधुरी (28)