और कहाँ ते सुमरिये
Utkntha Madhuri — श्री माधुरी दास
Verse 15 of 15
वृन्दावन विहरहिं सदा, गहे परस्पर बाँह।
लालच तिनके मिलन को, उपजि परो जिय माहिं॥
- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (4)
सदा वृन्दावन आओ, सदा एक दूसरे का दामन थामे रहो। तिनकों के मिलन का लोभ, उपज के लिए जीता हूँ... - श्री माधुरी दास, उत्सुक माधुरी (4)