उरज उतंग अति भरित भरे से अंग
Vallabh Rasik Vani — श्री वल्लभ रसिक
Verse 2 of 5
हम जुगल महल रस लिंदा,
कुंज अलिंदा उलंघि न जानैं। [1]
रस दारिंदा वृन्दावनगण
चरितन हू गहि छानैं॥ [2]
वन के वासिंदा सब निंदा करें,
सु को मन आनैं ? [3]
वल्लभरसिक चुनिंदा बिन को
निन्दा सुख पहिचानैं॥ [4]
- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी, सदा की माँझ (23)
हम जुगल महल रस लिंडा, कुंज अलिंदा उलंघी एन जनैन। [1] रस दरिंदा वृन्दावनगण चरितन हु गहि छीनैन।।[2] वनवासी सब निंदा करते हैं, तुमको बुरा क्यों नहीं लगता? [3] वल्लभ रसिक: बाहरी व्यक्ति की निंदा करें और सुख को पहचानें.. [4] - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक के शब्द, शाश्वत अर्थ (23)