महल मदन माती अली ये

Vallabh Rasik Vani — श्री वल्लभ रसिक

Verse 3 of 5

(राग विहागरो) महल मदन माती अली ये औरहि कहा मानें। अलबेली के संग भई अलबेली पहिरें बसन सहानें॥ [1] वेद भेद बिनु नेम प्रेम बिनु नेकुं न मन में आनें। अछन-अछन पग धरहिं कुंज मग मगज चढे असमानें॥ [2] अति सोहन मन मोहन हूँ सों बात ऐँंठ की ठानें। इनकी गति मति प्रीति नीति, वल्लभ रसिकहि जानें॥ [3] - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (राग विहगरो) महल मदन मति अली ये औराही कहा मानेन। अलबेली संग भाई, अलबेली पहनत बसन सहनेन.. [1] वेद भेद बिनु नेम प्रेम बिनु नेकुन एन मन में अनेन। प्रत्येक कदम, प्रत्येक कदम जो हम बोवर में उठाते हैं, मग असमान रूप से चढ़ता है। [2] अति सोहन मन मोहन, हम अनंत से बात करते हैं। उनकी गति मति प्रीति नीति, वल्लभ रसिकहि जनेन.. [3] - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक की वाणी
उरज उतंग अति भरित भरे से अंगउरज उतंग अति भरित भरे से अंग