उरज उतंग अति भरित भरे से अंग

Vallabh Rasik Vani — श्री वल्लभ रसिक

Verse 4 of 5

(कवित्त) उरज उतंग अति भरित भरे से अंग, अधर सुरंग सों रंगी सी मति जाति हैं। [1] ऊँची गुँथी वेणी सों तनेनी भौंह भई भरी, आई भरी छवि हँसि लसि इतराति हैं॥ [2] ‘वल्लभ रसिक’ दोऊ, सनमुख मुख सनें, चकित थकित कित दिवस कित राति हैं। [3] नैननि सिहानी ललचानी मुस्कानी, तरसानी सरसानी आनि-आनि दरसाति हैं॥ [4] - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी (कविता) उरज उतंग अतिभारित तन, मध्य सुरंग, पुत्र रंग मन। [1] ऊँचे गुंथे हुए बाल, पतली भौहें, भाई, भारी, ओह भारी छवि, हँसती और इठलाती.. [2] 'वल्लभ रसिका' जोड़ी, एक-दूसरे के सामने चेहरे, हैरान, थके हुए, इतनी रातें। [3] नैननि सिहाणी, लालचनि मुस्कानि, तरसनि सरसानि, अणि-अनि दरसति.. [4] - श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी।
महल मदन माती अली येउरज उतंग अति भरित भरे से अंग