रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को
Vinay Ke Pada — श्री किशोरी अलि
Verse 6 of 7
(राग गोड)
रुप हू के रुप तै अनूप रुप प्यारी को।
जग उजियारी जग जीवन की महारानी,
आनन्द न भावै अंग लोचन निहारी को॥ [1]
पावक प्रकाश चंद दामिनी की कहा चामी,
घटा दुरि जात ऐसो नीलो रंग सारी को।
‘किशोरी’ स्वामिनी हिये में बसौ,
अचल सुहाग ठकुराइन हमारी को॥ [2]
- श्री किशोरी अलि जी, विनय के पद (8)
(राग गोदा) रूप हू के रूप तै अनूप रूप प्यारी को। जगत जग प्रकाश जीवन रानी, आनंद न भावै अंग लोचन निहारी को.. [1] पावक प्रकाश चंद दामिनी की कह चामी, घट दूरि जात ऐसो नीलो रंग साड़ी को। 'किशोरी' स्वामिनी हिय मन बसौ, अचल सुहाग ठकुराइन हमारी प्यारी.. [2] - श्री किशोरी अली जी, विनय के पद (8)