अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि
Vinay Kundaliyan — श्री अलबेली अलि
Verse 3 of 11
ब्रजनागरि चूड़ामनि सुख सागर रस रास।
राखौ निज पद पिंजरे मम मन हंस हुलास॥ [1]
मम मन हंस हुलास बढ़े दिन दिन अतिभारी।
रहै सदा चित चाक लखै ज्यों चातक वारी॥ [2]
कामी के मन काम दाम ज्यों रंकहि भावै।
नवल कुंवर पद प्रीति सु ‘अलबेली अलि’ पावै॥ [3]
- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (7)
ब्रजनगर चूड़ामणि सुख सागर रस। अपने पद को पिंजरे में रखो, मेरा दिल खुशी से भर गया है। [1] मेरा हृदय आनन्द से भर गया है, बड़े दिनों के दिन अब भी भारी हैं। जितना हो सके हमेशा खुश रहो.. [2] कामी व्यक्ति के मन में जैसे ही काम की भावना आती है। नवल कुँवर पद प्रीति सु 'अलबेली अली' पावै.. [3] - श्री अलबेली अली, विनय कुण्डलिस (7)