अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि

Vinay Kundaliyan — श्री अलबेली अलि

Verse 5 of 11

काम क्रोध दंभनि भरयौ, बंध्यौ विषय की डोर। ऐसे क़ौं तुम सरन बिन, नाहिंन दूजौ ठौर॥ - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (9) काम, क्रोध और अहंकार का धागा तुम्हें बांधता है। सरन के बिना तुम कौन हो, कोई तुम्हारा ठिकाना न पा सके.. - श्री अलबेली अली, विनय कुंडलियान (9)
अहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरिअहो रसिक सुकुमारी करौ विनती कर जोरि