आगे की आगे गई अब न रुखाई देहु
Vivek Lakshan Beli — श्री चाचा हित वृंदावनदास
Verse 5 of 7
रसिक भक्त सौं हित करै, अंतरपटहि निवारि।
वृन्दावन हित तब लसैं, उर वर पिय-सुकुमारि॥
- श्री वृंदावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (27)
रसिक साधक को सौ लाभ मिलते हैं और आंतरिक रोगों से रक्षा होती है। वृन्दावन हित तब लसाईं, उर वर पिया-सुकुमारी.. - श्री वृन्दावन दास चाचा जी, विवेक लक्षण बेली (27)