करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय

Vrindavan Madhuri Md — श्री माधुरी दास

Verse 1 of 5

जो गावहिं सुमरहिं सदा, मन बच विपिन विलास। ते पावहिं सुख सहज ही, श्री वृन्दावन वास॥ - श्री माधुरी दास, वृंदावन माधुरी (92) गाँव सदा ग्रीष्म से भरा रहता है, मन विलासिता से भरा रहता है। मुझे सहज ही सुख मिलता है, श्री वृन्दावन बसते हैं.. - श्रीमाधुरी दास, वृन्दावन माधुरी (92)
करैं मनोरथ पिय के जो कछु उपजै जीय