ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि
Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य
Verse 1 of 14
आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश।
प्रगट विराजत अवनि पर, वृंदाविपिन सुदेश॥
- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (29)
आदि से अन्त तक मत जाओ, माया प्रवेश नहीं कर सकती। वृन्दाविपिन सुदेश अवनि के सिंहासन पर अवतरित हुए.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (29)