ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 2 of 14

ऐसौ वृंदाविपिन है, सर्वस रस को सार। श्री राधावर लाल को, निति नव नित्य विहार॥ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (15) ऐसी है वृंदाविपिन, सभी स्वादों का सार। श्री राधावर लाल को, नीति नव नित्य विहार.. - श्री रूपरासिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (15)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहिब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि