ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 14 of 14

वृंदावन यश सुनन की, जाकैं रुचि नहिं होइ। ताकौं तजिये तुरत हीं, वा सम दूरित न कोइ॥ - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (31) वृन्दावन की प्रसिद्धि सुनकर मेरी रुचि न रही। दूसरों में से कौन तुरंत हीन है, या कोई भी इतना तेज़ नहीं है.. - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (31)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि