ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि

Vrindavan Madhuri Rr — श्री रूपरसिक देवाचार्य

Verse 13 of 14

वृंदावन मैं रहन की, ऐसि रहैं मन मांहि। टूक टूक ह्वै जाय तन, तउ वन तजिएं नांहिं॥ - श्री रूप रसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (73) वृन्दावन में रहूँ क्या, ऐसे रहने का मन नहीं है। टुक टुक है जय तन, तौ वन तजिये नहीं.. - श्री रूप रसिक देवाचार्य, श्री वृन्दावन माधुरी (73)
ब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहिब्रह्मादिक वंछित रहैं, वृंदावन रज आंहि