यदैव सच्चिद्रसरूप
Vrindavan Mahimamrita — श्री प्रबोधानन्द सरस्वती
Verse 22 of 124
वृंदाटवी जयति कामगवी-सुरद्रु चिन्तामणीनगणितानपि तुच्छयन्ती।
श्रीशंकरद्रुहिणमुख्य सुरेन्द्रवृन्ददुर्ज्ञेय दिव्यमहिमैक रजःकणेन॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.36)
वृंदातवि जयति कामगावि-सूरद्रु चिंतामणिनगरितानाफि तुच्चयन्ति। श्रीशंकरद्रुहिना मुख्य सुन्दरवृंदादुर्जन्ये दिव्यमहिमाइक राजकानेन। - श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.36)