रूप गुन गंस के हंस अरु मोर

Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि

Verse 1 of 9

(कवित्त) अंग पर चीथरा हाथ में षीपरा, फिरों वन-वन भ्रमत आस मेरी। [1] फूल-फल-पात झर पर जो सहज ही, भूष की दाह में पाऊँ जेरी॥ [2] रूप बन नैन-उर छाई रहे रैनि दिन, निपट उन्मत्त हवै चित्त एरी। [3] आनन्द को चंद सुष-कंद पिय लाल करो, ‘अलबेली’ कब होइ सौं दृष्टि मेरी॥ [4] - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (25) (कविता) तन पर तस्वीर, हाथ में शिप्रा, फिरौन को मेरे जैसी लड़की चाहिए। [1] खिलता पानी आसानी से गिरता है, भूसे की राख में जेरी के पैर.. [2] बरसात के दिन, सुंदरता चमकती है, मन पागल हो जाता है। [3] सुष-कन्द पीकर आनंद को लाल कर दो, 'अलबेली' मैंने अपना शतक कब देखा.. [4] - श्री अलबेली अली, वृन्दावनसत् (25)
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति