अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति
Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि
Verse 2 of 9
(कवित्त)
अनुराग सौं भरी अस रूप गुन खरी अति,
माधुरी विपिन की कौन जानी। [1]
रति मैंन की सैंन लोटत जहाँ रैन दिन,
उमा और रमा सब सुधि भुलानी॥ [2]
नेत कहि नेत कहि निगम कौं दुर्गम अति,
नारदहि कछु श्री पति बखानि। [3]
परै सोइ आई अलबेली नैंननि कबै
राज जहाँ राधिका कुंवरि रानी॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (13)
(कविता) अनुराग सौं भारी अस रूप गुन खरी अति, कौन जाने माधुरी विपिन। [1] जहाँ दिन-रात वर्षा होती रहती है, वहाँ उमा और राम अपनी सारी स्मृतियाँ भूल जाते हैं। [2] कहां है जाल, कहां है निगम, जो है दुर्गम, नारदहि कछु श्री पति बखानि। [3] हे अलबेली नानानी, कहाँ सोये राजा, कहाँ है राधा कुमारी महारानी.. [4] - श्री अलबेली अली, वृन्दावन सत (13)