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Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि
Verse 5 of 9
(सवैया)
नमो वनवृन्द अरविंद रससिंध कौ, स्त्रवत मकरंद आनन्दकारी।
हरत मन नीलमनि जगमगत कनक दुति, चकाचौंध लषि चषत हारी॥ [1]
महेस और सेस ब्रह्मादि शुकमुनि सबै, कोटि सत सारदा कहत हारी।
पार को पाइ है और अलबेली जहाँ, फिरत उन्मत्त तहां पीय प्यारी॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (6)
(सवैया) नमो वनवृंद अरविंद रसिंध कौ, स्त्रवत मकरंद आनंदकारी। हरा मन नीलमणि से भरा है, कनक की चमकती किरणें, हरि की चमकती किरणें। [1] महेश और सेस ब्रह्मादि शुकमुनि सबै, कोटि सत सारदा हरि कहते हैं। जहाँ शांति और मासूमियत है, वहाँ दुनिया में पागलपन है, वहाँ प्यार है और प्यार किया जाना चाहिए.. [2] - श्री अलबेली अली, वृन्दावन सत (6)