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Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि
Verse 4 of 9
(कवित्त)
भरै द्रग वारि उच्चार वन प्रेम सौं,
पूर्ण सोई प्रीति कब होइ मन की। [1]
षान और पान सुख सैन जो ना मिले,
दैव-गति होइ जो हासि तन की॥ [2]
विवस ह्वै जाइ अँग-अंग सत टूक जो,
तजत नहीं सूर ज्यौं भूमि रन की। [3]
होहि तन छीन दुषलीन जो कोटि विधि,
अलबेली जिन जाव रज छाँड़ि बन की॥ [4]
- श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (24)
(कविता) मन का प्यार कब भर गया? [1] यदि हमें वैभव और परम सुख न मिले, तो हमारे शरीर की मुस्कान दिव्य हो जाती है.. [2] हमारे शरीर का हर अंग नष्ट हो जाता है, ऐसा नहीं है कि यह कोई युद्ध का मैदान है। [3] होहि तन छिन दुशालिन जो कोति विधि, अलबेली जिन जाव राज छंदई बन की.. [4] - श्री अलबेली अली, वृन्दावन सत (24)