रूप गुन गंस के हंस अरु मोर

Vrindavan Sata — श्री अलबेली अलि

Verse 7 of 9

रूप गुन गंस के हंस अरु मोर, पिक रहत मद प्रेम के रंग भीने। [1] कोकिला, सारि, सुक, बिहंग बहु रंग के, फिरत हैं रैनि-दिन नेह लीने॥ [2] मृगी और बाघ अनुराग के रंग भरि, करत कल केलि मिलि बैर हीने। [3] आनंद को धाम अभिराम वृन्दाविपिन, सुमिरि अलबेली अलि हिय हेत दीने॥ [4] - श्री अलबेली अलि, वृंदावनसत (8) रूप गुन गन्स के एचएनएस अरु मोर, पिक रहत मद प्रेम के रंग भिने। [1] कोकिला, साड़ी, रेशम, बंगाल बहुरंगी, बरसात के दिन में घूम रहे हैं.. [2] हिरण और बाघ प्रेम के रंग में डूबे हुए हैं, सुबह वे एक दूसरे से नहीं मिलते हैं। (8)
प्रेम अनुराग सों चित्त उन्मत्त हवैदेवी वृन्दाविपिन की, वृन्दा सखी सरूप।