इन्द्र-मद-मर्दन दुर्ग

Vrindavan Shataka — श्री लाल बलबीर

Verse 4 of 10

(कवित्त) कीरति किसोरी वृषभान की दुलारी प्यारी, अरज हमारी सुकमारी कान कीजै री। [1] भ्रमना भ्रमावै छिन छिन अकुलावै मन, कछुना सुहावै उर धीरज धरीजै री॥ [2] 'लाल बलबीर' दासी चेरी हैं चरन ही की, सरन लई हैं सो निभाय मोहि लीजै री। [3] कीजै दीन जान दान एहो करुनानिधान, सदा तेरौ ध्यान औ निकुंज बास दीजै री॥ [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, राधा शतक (98) (कविता) कीर्ति किसोरी, वृषभान की प्यारी प्यारी, सुनो मंगलकामना हमारी। [1]. [3] हर दिन लोगों को मुझ पर तरस आता है, मैं तो हर वक्त तुम पर ध्यान देता हूं और बस तुम्हें अपना नाम दे देता हूं.. [4] - श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, राधा शतक (98)
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