अंत अनंत साधन करै
Vrindavan Vas Avastha — श्री अनन्य अली
Verse 4 of 8
मान अपमान अभिमान तजि, करि वृन्दावन वास।
रज में रजरज ह्वै रहौ, मन में अधिक प्रकाश॥
- श्री अनन्य अली, श्री अनन्य अली जी की वाणी, श्री वृंदावन वास अवस्था (2.83)
मन, अपमान और अभिमान त्याग कर वृन्दावन में निवास करो। राज्य में राजा की तरह रहो, मन में अधिक प्रकाश.. - श्री अनन्या अली, श्री अनन्या अली जी के शब्द, श्री वृन्दावन निवास राज्य (2.83)