वृन्दावन नीरस रसिक बनावत
Vrindavan Virudavali — श्री चरणदास
Verse 5 of 6
वृन्दावन महिमा अपरम्पार।
श्यामसुन्दर भोक्ता रस श्यामा वृन्दावन आधार॥ [1]
तीनों तीनों का पूरक मिलि होबत नित्य विहार।
दो मिले एक नहिं संग होवे तो नहिं लीला विस्तार॥ [2]
दो मिले कुरुक्षेत्र में फिर भी नहिं हिय रस संचार।
वृन्दावन तन प्राण हैं राधा मन हैं नन्दकुमार॥ [3]
भजहु संग करि इन तीनन तब होवै सुख साकार।
‘राधाचरणदास' बिनु इनके रस साधन बेकार॥ [4]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)
वृन्दावन की महिमा अपरंपार है। श्यामसुन्दर भोक्ता रस श्यामा वृन्दावन अधर।।[1] तीनों की तृप्ति पाओ, नित्य विहार पाओ। दो कोस एक साथ न हो तो लीला का विस्तार नहीं होता। [2] कुरूक्षेत्र में दो कोस में भी रस की धारा नहीं बहती। वृन्दावन, तन मन राधा है, मन नन्दकुमार है। [3] तभी तो भजहुन से सुख पाओगे। 'राधाचरण दास' इनके बिना साधन व्यर्थ हैं.. [4] - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली (32)