वृन्दावन नीरस रसिक बनावत
Vrindavan Virudavali — श्री चरणदास
Verse 6 of 6
वृन्दावन नीरस रसिक बनावत।
जग परिहरि जो शरण गहत, ताकर सब दोष नसावत॥ [1]
अपनो करि निज गोद बिठावत, सब विध योग्य बनावत।
देकर युगल की सेवा उसको, नित्य निकुञ्ज बसावत॥ [2]
रसमय बनवत नित ता ऊपर, नव नव रस बरसावत।
‘राधाचरणदास’ बना ताही, रस सिन्धु डुबावत॥ [3]
- श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली
वृन्दावन की उदास एवं रूमानी संरचना. जो समस्त दोषों को दूर हुआ देखकर संसार का आश्रय लेता है... [1] अपनी इच्छा के अनुसार अपने ईश्वर का पालन करो और सभी विधियों को योगी बनाओ। उनको दम्पति की सेवा देकर, नीति निकुंज बसावत।।[2] रसमय बनावत नीता ता ऊपर, नव नव रस बरसावत। 'राधाचरण दास' बाना ताही, रस सिंधु डूबावत.. [3] - श्री राधाचरण दास, वृन्दावन विरुदावली