रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन
Vrindavipun Vilasa — श्री किशोर दास
Verse 4 of 8
मन तें श्री वृंदाविपिन, बसत रहत सब काल।
सखी सहेली रूप धरि, निरखत ललना लाल॥
- श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (11)
मेरा मन श्रीवृंदाविपिन से भर गया है, सब कुछ हमेशा के लिए रहता है। सखी सहेली रूप धारी, निरखत ललना लाल.. - श्री किशोर दास, श्री वृन्दाविपुन विलास (11)