रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन

Vrindavipun Vilasa — श्री किशोर दास

Verse 6 of 8

रसिक अनन्य उपासिका, भाव भरे रस ऐंन। तें नित नैनन तें लखत, कहत नाँहिं कहुँ वैंन॥ - श्री किशोर दास, श्री वृंदाविपुन विलास (6) रसिक एवं अन्य उपासक, भाव-संवेदना से परिपूर्ण। दस नित नयन, दस लाख, कुछ नहीं कहा जा सकता... - श्री किशोर दास, श्री वृंदावीपुन विलास (6)
रसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंनरसिक अनन्य उपासिका भाव भरे रस ऐंन