कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 10 of 139
(राग सारंग)
प्यारी श्रीवृंदावन की रैनु।
जाहि निरख मोहन सुख पावत हरषि बजावत वैनु॥ [1]
जहां तहां राधा चरननिं के अंक विराजत अैनु।
राजभोग संयोग जहाँ तहाँ दंपति के रति सैनु॥ [2]
रसिक अनन्यनि को मुख मंडन दुख खंडन सुख चैनु।
मधु मकरंद चंद रस वरषत गो धन को निज फैनु॥ [3]
कुंजनि पुंजनिकी छबि निरखत रति भूली पति मैनु।
व्यास दास को कुँवर किशोरी वाँयौ दाहिनौ नैनु॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (9)
(राग सारंग) श्री वृन्दावन के प्रिय रैणु। जाहि निरख मोहन सुख पावत हरषि बजावत वेणु।।[1] वहाँ राधा के चरणों के अनेक स्थान स्थित हैं। राजभोग स्नान योग जहां युगल रति सानु.. [2] रसिक अनन्यानि को मुख मंडन दुख दंदन सुख चैनु। मधु मकरंद छंद रस वर्षत गो धन को निज फेनु.. [3] कुंजनि पुंजनिकी छबि निरखत रति भूलि पति मैनु। व्यास दास को कुँवर किशोरी वन्यौ दहिनौ नैनु.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, प्रथम भाग (9)