चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 103 of 139

(राग वसंत) चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ। झूलत फूलनि के झँवरा, मारूत मकरंद उड़ायौ॥ [1] मधुकर कोकिल कीर केकी मिलि, कोलाहल उपजायौ। नाँचत श्याम बजावत गावत, राधा राग जमायौ॥ [2] चोबा चंदन बूका वंदन, लाल गुलाल उड़ायौ। व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, रोम रोम सचु पायौ॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326) (राग वसंत) चलो, वृन्दावन वसंत आ गया है। झूलत फुलानी के झंवारा, मारुत मकरंद उदयौ।।[1] मधुकर कोकिल किर केकी मिलि, कोलाहला उपजायु। ननचत श्याम बजावत गावत, राधा राग जमायौ.. [2] चोबा चंदन बुका वंदन, लाल गुलाल उडयौ। व्यास स्वामिनी निरखत, रोम रोम सचु पिउ.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, स्व. (326)
झूलत फूलत कुंजविहारीआजु बधाई है बरसानैं