किशोरी मोहि अपनी कर लीजै

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 113 of 139

(राग गौरी) किशोरी मोहि अपनी कर लीजै। और दिये कछु भावत नाहीं, श्री वृन्दावन रज दीजै॥ [1] खग मृग पशु पंछी या बनके, चरन सरन रख लीजै। व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, महल टहलनी कीजै॥ [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (294) (राग गौरी) किशोरी मोहि निज समझो। और बदले में मुझे कुछ मत दो, मुझे श्री वृन्दावन का राज्य दे दो.. [1] हिरण, पशु या पक्षी के रूप में मेरे चरणों की राख ले लो। महल में घूमती हुई व्यास स्वामिनी की छवि अलिखित है.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (294)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारकिशोरी मोहि अपनी कर लीजै