किशोरी मोहि अपनी कर लीजै
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 114 of 139
(राग गौरी)
किशोरी तेरे चरनन की रज पाऊँ।
बैठी रहूं कुंजन के कोने, श्याम राधिका गाऊं॥ [1]
जो रज शिव सनकादिक लोचत, सो रज शीश चढ़ाऊँ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, विमल विमल जस गाऊं॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)
(राग गौरी) किशोरी तेरे चरणों की प्रीत। जहाँ कुंजन बिराजे, श्याम राधिका गाय। [1] जहां राजा शिव झुकते हैं, वहां मैं राजा को सिर झुकाता हूं। व्यास स्वामिनी निरखत की छवि, विमल विमल जस गौं.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (293)