पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 122 of 139

(राग केदारौ) पियकौ नाँचन सिखवत प्यारी। वृंदावन महँ रास रच्यौ है, सरद-चंद उजियारी॥ [1] ताल मृदंग उपंग बजावति, प्रफुलित ह्वै सखि सारी। वीन, वेनुध्वनि नूपुर ठुमकत, खग, मृग दसा विसारी॥ [2] मान, गुमान लकुट लियैं ठाढ़ी, डरपत कुंजविहारी। व्यासस्वामिनी की छबि निरखत, हँसि हँसि दै कर तारी॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (230) (राग केदारौ) पियाकौ नांचन सिखावत प्यारी। वृन्दावन महान रस का रचयिता है, सारदा-छंद प्रकाश है.. [1] ताल मृदंग उपंग बाजवति, प्रफुल्लत ह्वै सखी सारी। विन, वेणुध्वनि नूपुर ठुमकट, खग, मृग दसा विसारि। [2] मन गुमान लकुट लियायिन थदै, दरपत कुंजविहारी। व्यास स्वामिनी की छवि अलिखित, हँसती, नाचती... [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, भाग 2 (230)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारकहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ