कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 123 of 139

(राग सारंग) प्‍यारे वृन्‍दावन के रूख। जिनितर राधा-मोहन विहरत देखत भाजत भूख॥ [1] माया काल न व्‍यापै जिनितर सींचे प्रेम-पियूख। कोटि गाय बाँझन हत शाखा तोरत हरिहिं विदूख॥ [2] रसिकनि पारिजात सूझत हैं विमुखनि ढ़ाक पिलूख। जो भजिये तौ तजिये पान मिठाई मेवा ऊख॥ [3] जिनि के रस-बस गोपिनु छाँड़े सुख-संपति गृह तूख। मणि कंचन मय कुंज विराजत रंध्रनि चन्‍द्र मयूख॥ [4] जिहिं रस भोजन तज्‍यौ परीक्षित उपज्‍यौ शुकहिं अतूख। व्‍यास पपीहा बन-घन सेयौ दुख-सलिता-सर सूख॥ [5] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (10) (राग सारंग) प्रिय वृन्दावन दिशा। जिनितर राधा-मोहन विहारत देखत भजत बुख.. [1] माया कल न व्यापै जिनितर सिंचे प्रेमा-पियुख। कोटि गे बांझन हत शाखा तोरत हरिहिं विदुख.. [2] रसिकानि पारिजात सुजात है विमुखनि धाक पिलुख। पान, मिठाई, मेवा जो भी परोसे, भोग लगेगा.. [3] जिनि के रस-बस गोपिनु छन्दे सुख-स्नापति गृह तुख। मणि कंचन मय कुंज विराजत रंधरानी चंद्र मयूख..[4] जिहिं रस भोजन तज्यु परीक्षित उपजयु सुखिन अतुख। व्यास पपीहा बाण-घन सेयौ दुःख-सलिता-सर सुख.. [5] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, स्वर्गीय (10)
पियकौ नाँचन सिखवत प्यारीकहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ