कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 124 of 139
(राग सारंग)
प्यारी लागै श्रीवृन्दावन की धूरि।
राधे जू रानी मोहन राजा, राज सदा भरिपूरि॥ [1]
कनक-कलस करुवा महमूँदी, खासा ब्रज-कमरिनु की चूरि।
‘व्यासहिं’ श्रीहरिवंश बताई, अपनी जीवनमूरि॥ [2]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (14)
(राग सारंग) श्री वृन्दावन की धुरी प्यारी है। राधे जू रानी मोहन राजा, राज सदा भरिपुरी।।[1] कनक-कलस करुवा महामुण्डी, खासा ब्रज-कमरिणु की छुरी। 'व्यासहिं' श्री हरिवंश, मुझे अपने जीवन के बारे में बताएं.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (14)