कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 16 of 139

(राग सारंग) कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ। मोसे नीच पोच कौं अनत न, हरि बिनु और न ठाउँ॥ [1] सुख पुंजनि कुंजनि के देखत, विषय विषै क्यों पाउँ। एक आगि को डाढ्यौ दूजी, आगि माँझ न बुझाउँ॥ [2] एक प्रसन्न न मोपर निसि दिन, छिन छिन सबै कुदाउँ। राधारवन सरन बिनु अब हौं, काके पेट समाउँ॥ [3] भोजन छाजन की चिंता नहिं, मरिवेहु न डराउँ । सिर पर सिंदुर व्यास धरयौ अब, ह्वै है स्याम सहाउँ॥ [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18) (राग सारंग) मैं कहाँ हूँ, वृन्दावन? कोई अंत नजर नहीं आता, कोई अंत नजर नहीं आता, कोई अंत नजर नहीं आता। [1] क्यों सुख का सुख देखते हो, क्यों संसार में कुछ भी नहीं है। मैं आग जलाता हूं, लेकिन मैं आग नहीं बुझाता.. [2] मैं हर दिन खुश नहीं हूं, मैं कभी-कभी कूद जाता हूं। अब मैं राधारावण के आशीर्वाद के बिना हूं, मेरा पेट भर गया है.. [3] भोजन खोजने की चिंता मत करो, शादी करने से मत डरो। अब मस्तक पर सिन्दूर धारण करो व्यास, क्या है श्यामा सहौं.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (18)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार