कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 33 of 139
(राग सारंग)
पाछैं बैठे मोहन मृगनैंनींकी बैंनी गुहत,
सोभा न कही परै देखत नैंन सिरात। [1]
नखछबि रवि जानि पानि-कमल फूले,
निकसि चली अलि सैंनी अधरात॥ [2]
मानौं वारिज विधुसौं रिपु मति तजि,
सदल सुधा पीवत न अघात। [3]
श्याम-भुजंगिनिके डर डोरी बांधत,
व्यासकी स्वामिनीकौ सुंदर अकुलात॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (44)
(राग सारंगा) मोहन मृगनीन की छोटी सी गुफा मेरे पीछे बैठी है, सोभा कहीं और है, मेरी आँखें तुम्हें देख रही हैं। [1] नखचबि रवि जानि जल-कमल खिले, निकसी चली अली सैनी अधरत।।[2] मनौं वरिज विधुसौं रिपु मति तजि, सदल सुधा पिवत न अघट। [3] श्यामा-भुजंगिनी के कंधों के बीच बंधी है डोरी, व्यास की स्वामिनी की सुंदर अकुलात.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (44)