सबकौ भाँवतौ राधावर

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 37 of 139

(राग बिलावल) सबकौ भाँवतौ राधावर। पूत यशोदाकौ नँदनंदन व्रजलाड़िलौ स्यामसुन्दर॥ [1] कुंजविहारी सदा सिंगारी, गावत नाचत सदा सुघर। कोककला-कुल रसिकमुकुटमनि, वारिज मुख सुख सागर॥ [2] महा पतित पावन चरनिनिके शरन रहत काकौ डर। व्यास अनन्य रसिकमंडल कौ, पोषक मान सरोवर॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (49) (राग बिलावाला) सबको एक जैसा लगता है, राधावर। पूत यशोदकौ नन्दानन्द व्रजलादैलौ श्यामसुन्दर।।[1] कुंजविहारी सदा सिंगारी, गावत नाचत सदा सुघर। कोकाकला-कुल रसिकमुकुटमणि, वारिज मुख सुख सागर।।[2] काकौ दर, महान पतित संत, चरणिणी के आश्रय में रहते हैं। व्यास अन्य रसिकमंडल कौ, पोषक मन सरोवर.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (49)
खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सारखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार