श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 43 of 139
(राग विलावल व सारंग)
श्रीराधा प्यारी के चरनारविंद सीतल सुखदाई।
कोटिचंद मंद करत, नखविधु जुन्हाई॥ [1]
ताप, शाप, रोग, सोग दारुन दुखहारी।
कालकूट दुष्टदवन कुंजभवन चारी॥ [2]
स्याम हृदय भूषन युत दूषन जित संगी।
वृंदावन धूरि धूसर रास रसिक रंगी॥ [3]
सरनागत अभय विरद, पतित पावन वानै।
व्यास से अति अधम आतुर को, कौंन समानै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (57)
(राग विलावल वि सारंगा) श्री राधा प्यारी के चरणों में शीतल सुखदाई। कोटिचंद धीमे, नकविधु जुन्हाई..[1] तप, रूप, रोग, शोक और संताप अत्यंत कष्टकारी हैं। कालकूट रोखड़ावन कुंजभवन चारी..[2] स्याम हृदय भूषण युत दूषण जित स्नगी। वृन्दावन की धुरी भूरे, गुलाबी और गुलाबी रंग की है.. [3] शरणागत भक्तों, पापियों का पवित्र स्थान। व्यास में सबसे हीन और जिज्ञासु व्यक्ति कौन है? [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, प्रथम भाग (57)