कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 59 of 139
(राग सारंग)
राधिका मोहन की प्यारी। [1]
नखसिख रूप अनूप गुन सीमा, नागरि श्रीवृषभानदुलारी॥ [2]
वृंदाविपिन निकुंजभवन तन कोटिचंद उजियारी। [3]
नव नव प्रीति प्रतीति रीति रस वस किये कुंजविहारी॥ [4]
सुभग सुहाग प्रेमरँग राची, अँग अँग श्याम सिंगारी। [5]
व्यास स्वामिनी के पदनख पर,वलि वलिजात रसिक नरनारी॥ [6]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (79)
(राग सारंगा)राधिका मोहन की प्रेयसी। [1] नखसिख रूप अनुप गुन सिमा, नागरी श्रीवृषभनादुलारी। [2] वृंदाविपिन निकुंजभवन तन कोटिचंद उजियारि। [3] कुंजविहारी बस्ति नव प्रेम प्रेम रीत.. [4] सुभग सुहाग प्रेमरंग रचि, अंग अंग श्याम सिंगारी। [5] व्यास स्वामिनी के चरणों में, वलि वलिजात रसिक नारानारि.. [6] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, स्वर्गीय (79)