महिमा स्याम की हम जानी

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 68 of 139

(राग धनाश्री) आरती कीजै जुगलकिसोर की। नखसिख अंग बलैया लीजै, साँझ दुपहरी भोर की॥ [1] भूषण पट नागरि नट अद्भुत, चितवनि चंचल कोरकी। व्यासदासि छबि नैंननि फबि रही, अंचल चंचल छोर की॥ [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्द्ध (97) (राग धनाश्री) जुगल किशोर की आरती. नखासिख अंग बलैया लिजै, शाम दोपहर भोर..[1] भूषण पट नागरी नट अद्भुत, चितावनि चंचल कोराकी। व्यासदासी की छवि सुन्दर रही, आँचल चंचल हो गया.. [2] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, स्वर्गीय (97)
व्यास न कबहूँ उपजि हैखरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार