नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 88 of 139
(राग केदारो)
नाँचत गोपाल वनैं नटवर वपु काछैं।
गावति गति मिलवत अति, राधा के पाछैं॥ [1]
किंकिनि कंकन नूपुर धुनि, ताल मृदंग सोहैं।
मन्दहाँस भ्रु-विलास सैंननि मन-मोहैं॥ [2]
तरुवर गिरिवर मृग नाद वान पोहैं।
वृंदारक-वृंद-वधू तारक विधु मोहैं॥ [3]
समीर नीर पंगु भयौ, बालक न पय प्यावैं।
व्यास सकल-जीव-जंतु नाद स्वाद ज्यावैं॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (167)
(राग केदारो) नांचत गोपाल वनैं नटवर वपु कछैं। गावति गति मिलावत अति, राधा की पीठ। [1] किंकिनी कंकण नूपुर धुनि, ताल मृदंग सोहें। मंदहंस भ्रू-विलास सन्यानि मन-मोहेन..[2] तरुवर गिरिवर मृग नाद वन पोहेन। वृन्दारक-वृन्दा-वधू तारक विधु मोहें।।[3] समीर नीर पिंगु भयौ, बालक न पइवैं। व्यास सकल-प्राण-पशु नाद स्वाद जावयन्। [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, स्वर्गीय (167)