खरौ-खरौ सब लेत हैं परखि पारखू सार

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 93 of 139

अनन्य व्रत खाँडेकीसी धार। इत-उत डगत जगत हिततेहरि, फेरि न करत सम्हार॥ [1] कहा ग्यासि कुल-कर्मनि छाँड़े, जोलगि विषय विकार। बिनु प्रेमहि, न प्रसाद नेम तहाँ, हरि न ग्रहत ज्यौंनार॥ [2] कौन काम कीरति बिनु प्रीतिहि, गनिका कैसो जार। व्यासदासकी पति गति नासै, गयैं पराये द्वार॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175) अन्य व्रत खंडेकसी धार. इता-उत दगत जगत हितैहारी, फेरी न करत सहमार.. [1] कह ग्यासी कुल-कर्माणि छंदे, जोलागी विषय विकार। प्रेम के बिना न प्रसाद, न हरि, न स्वागत। [2] प्रेम के बिना प्रसिद्धि का क्या लाभ? ये कैसी वेश्या है? व्यासदास पति की गति सीमित है, गायें दूसरे के द्वार पर हैं। [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (175)
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँकहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ