कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 94 of 139
(राग सारंग)
अनन्यनि कौनकी परवाहि।
कुंज-विहारीकी आसा करि, लै कमरी करवाहि॥ [1]
कोटि मुकुति सुख होत गोखरू,जबै गड़ै तरवाहि।
(श्री) वृन्दावनके देखत भाजै नैननिकी हरवाहि॥ [2]
जमुना कूल फूल फल फूलत, गोरस की भरवाहि।
निसिदिन स्याम कामवस सेवत, राधाकी घरवाहि॥ [3]
रीझत जाहि राजसी जब तब, मारत पाथर वाहि।
इतनी आस व्यास तजि भजिये, गुदी बाँधि सरवाहि॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)
(राग सारंगा) अनन्यानि कौनाकि परवही। कुंजा-विहारिकी आसा कारी, लै कामारी करावाही..[1] कोटि मुकुति सुखो होता खोखरू, जाबै गदै तारावही। (श्री) वृन्दावन के देख भजै नान्यानिकी हरवाही..[2] जमुना फूलों से भरी है, गोरस से भरी है। निसिदिन स्याम कामवस सेवत, राधा का घर वही है। [3] जब वह राजसी हो जाता है तो पत्थर मार देता है। इतानि अस व्यास तजि भजिये, गुड़ी बांधि सर्वहि..[4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (176)